श्री लाला टीकाराम जी नगर की महान विभूति श्री टीकाराम जी का जन्म अभिजात अग्रवाल वैश्य कुल में विक्रम सम्वत् 1923 वैशाख की एकादशी को हुआ। लालाजी के जन्म के समय इनके पिता श्री कृष्णदास जी की आर्थिक दशा बड़ी शोचनीय थी तथा गृह-कार्य एक छोटी सी दुकान से चलता था। इनका 13 वर्ष की आयु में मुरसान निवासिनी श्री रेवती देवी जी के साथ इनका पाणिग्रहण संस्कार हुआ। लालाजी ने अपने पुरूषार्थ से अपने व्यवसाय को अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न बनाया। वे साहस, दूरदर्शीता, कठिन परिश्रम, सत्यव्यवहार से परिपूर्ण होने के साथ सच्चे अर्थों में धर्मपंथी व समाज सुधारक थे। इनका विचार था कि नारी का सम्मान व समाज का उत्थान नारी शक्ति से ही सम्भव है। इसी उच्च सोच के साथ लाल टीकाराम जी नें 1937 में बालिकाओं के लिए एक कन्या पाठशाला का आरम्भ किया। जिसे 27 जनवरी 1937 में हाईस्कूल, 1944 में इण्टरमीडिएट व 1957 में डिग्र्री कॉलेज की मान्यता मिली। लाला टीकाराम जी का मानना था कि जबतक अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ वैदिक संस्कृति को जोड़ा नहीं जाएगा, समाज व देश का उत्थान असम्भव हैं सादा जीवन उच्च विचार उक्ति को चरितार्थ करने वाले लाला टीकाराम जी का योगदान धर्म के क्षेत्र में भी अप्रतिम व अनुकरणीय है। उन्होंने समाज कल्याण व धर्म सेवार्थ श्री टीकाराम परिवार धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया। उनके द्वारा बनवाया गया श्री राम जानकी मन्दिर उनकी धर्म उपासना का प्रतीक है। ऐसी आभा, जो इस रंगमंच पर अपनी झलक दिखाने आयी थी, अपनी दिव्य प्रभा से नगर को आलोकित कर अनन्त में विलीन हो गयी तथा पूज्य योगीराज मौनी बाबा की साक्षी में 16 अगस्त 1952 को सर्व जनप्रिय लालाजी यह लोक छोड़ परलोक वासी हुए। परन्तु आज भी वह अपने यश रूपी शरीर से जीवित है।